नई दिल्ली ।

दिल्ली में पढ़ रही सिक्किम की छात्रा अवनी लखोटिया लेप्चा भाषा को बचाने में जुटी है। दरअसल लेप्चा सिक्किम, पश्चिम बंगाल, नेपाल और भूटान के कुछ विशेष क्षेत्र में आदिवासी समुदाय द्वारा इस्तेमाल की जाती है। वर्तमान में हिमालयी क्षेत्र में करीब 50 हजार लोग इसे बोलते हैं, लेकिन इनमें बुजुर्ग ज्यादा हैं। इसलिए इसे लुप्तप्राय भाषा की श्रेणी में रखा गया है।



वहीं अब अवनी इस भाषा को नए अक्षर देने में जुटी है। लिखने व पढ़ने में कठिन इस भाषा को बचाने और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए ने इसके अक्षरों को नए सिरे से तैयार किया है। कुल 74 प्रकार के अक्षर व अंक हैं, जो लेप्चा को आसान बनाएंगे। उनके मुताबिक प्रारंभिक परीक्षण में लोगों ने इसे सराहा है, यह जल्द आम लोगों के लिए भी उपलब्ध हो जाएगा।




दिल्ली के एक कॉलेज से डिजाइनिंग में पोस्ट ग्रेजुएट करने वाली अवनी ने बताया कि कॉलेज के प्रोजक्ट में उन्हें भाषा पर काम करने को कहा गया। उन्होंने लुप्त होते जा रहे भाषाओं पर जानकारी इकट्ठा की तो उन्हें अपने गृहराज्य के लेप्चा भाषा के बारे में पता चला। उनके माता-पिता गंगटोक के रहने वाले हैं।



उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी समस्या इसको लिखने और पढ़ने में आई, क्योंकि इसके अक्षर कैलीग्राफी (अक्षरांकन) में हैं। इसके साथ ही कई अक्षर गायब हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जा रहे कुछ अक्षर एक-दूसरे के यहां मान्य नहीं थे। ऐसे में उन्होंने कुछ नए अक्षर भी इजाद किए हैं।



शोध, अध्ययन और प्रयोग में उन्हें चार से पांच माह लगे, जिसमें कुछ माह उन्होंने सिक्किम में गुजारे। उन्होंने जो अक्षर तैयार किए हैं वह कैलीग्राफी व रोमन अक्षरों का मिश्रण है, जिसमें नीचे की लाइन के अक्षर ऊपर की लाइन के अक्षर से टकराते नहीं है।



लेप्चा भाषा का इस्तेमाल लेप्चा आदिवासी करते हैं। लेप्चा भाषा की उत्पत्ति 200 से 300 वर्ष पहले बताया जाता है। यह कैलीग्राफी स्टाइल में लिखे जाते हैं, जो देखने में काफी आकर्षक लगते हैं, लेकिन लिखने और पढ़ने में यह ज्यादा कठिन हैं। इसलिए भी इसका विस्तार नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2001 में टेक्स्ट बुक की छपाई के लिए इसके अक्षर आए, लेकिन पेचीदा लिखावट के कारण यह संभव न हो सका।